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सम्पूर्ण शिवताण्डवस्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित |

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शिवताण्डवस्तोत्रम्:  भगवान शिव की स्तुति में गाया गया एक परम प्रभावशाली और ओजस्वी स्तोत्र है। इसकी रचना लंकापति रावण ने की थी । 'स्तोत्ररत्नावली' के अनुसार, जो व्यक्ति पूजा के अंत में इस स्तोत्र का गान करता है, भगवान शंकर उसे स्थिर रथ, गज, अश्व आदि से युक्त सदैव सुमुखी रहने वाली सम्पत्ति (लक्ष्मी) प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र न केवल शिवजी के सौंदर्य का वर्णन करता है, बल्कि भक्त को परम शांति और पवित्रता भी प्रदान करता है। ॥ अथ श्रीशिवताण्डवस्तोत्रम् ॥ जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥ हिंदी अर्थ: जिन्होंने जटारूपी अटवी (वन) से निकलती हुई गङ्गाजी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गये गले में साँपों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर, डमरू के डम-डम शब्दों से मण्डित प्रचण्ड ताण्डव (नृत्य) किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें। जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२...

महाशिवरात्रि 2026: 15 फरवरी को बन रहा अद्भुत संयोग! जानें निशिता काल मुहूर्त की संपूर्ण विधि

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महाशिवरात्रि 2026: हर हर महादेव! सनातन धर्म में महाशिवरात्रि को ' शिव की महान रात्रि ' कहा जाता है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्म-जागृति और शिव तत्व से एकाकार होने का महापर्व है। वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि पर श्रवण नक्षत्र और वरियान योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो भक्तों की मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत शुभ है। यदि आप इस वर्ष भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो शास्त्रों में वर्णित सही मुहूर्त और 'रुद्राष्टाध्यायी' एवं 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' पर आधारित प्रामाणिक पूजा विधि यहाँ दी गई है। महाशिवरात्रि २०२६: तिथि और मुहूर्त तारीख: रविवार, १५ फरवरी २०२६ तिथि: फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी  चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: १५ फरवरी २०२६ - शाम ०५:०४ बजे चतुर्दशी तिथि समाप्ति: १६ फरवरी २०२६ - शाम ०५:३४ बजे नोट: चूँकि यह "महा-रात्रि" ( महाशिवरात्रि ) का त्योहार है, इसलिए मुख्य पूजा १५ फरवरी २०२६ की रात्रि को ही होगी, भले ही तिथि १६ फरवरी तक रहे। पूजा मुहूर्त और प्रहर समय महाशिवरात्रि 2026 ' पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर...

कलश पूजन कैसे करें? सही मंत्र, नियम और शास्त्रानुसार महत्त्व

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कलश पूजन विधि: सनातन धर्म में किसी भी पूजा का शुभारंभ गणेश पूजन   'कलश पूजन' या 'उदकुम्भ-पूजा' के बिना अधूरा माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, कलश में सभी देवी-देवताओं, समुद्रों और पवित्र नदियों का वास होता है। कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र और मूल में ब्रह्माजी स्थित होते हैं। नित्य पूजा और विशेष अनुष्ठानों में सुवासित जल से भरे कलश का पूजन अनिवार्य है। इस लेख में हम शास्त्रों में वर्णित कलश पूजन की प्रामाणिक विधि और मंत्रों को विस्तार से जानेंगे। 1. कलश पूजन की तैयारी और सामग्री पूजन आरंभ करने से पूर्व कुछ विशेष तैयारियों का ध्यान रखना आवश्यक है: • जल की शुद्धता: ताजे जल को कपड़े से छानकर कलश में भरें। शास्त्रों में बासी जल का निषेध है, लेकिन गंगाजल कभी बासी नहीं होता। • सुवासित जल: कलश के जल को सुगंधित करने के लिए उसमें थोड़ा कपूर, केसर और चंदन घिसकर मिला दें या पवित्र इत्र डाल दें। • सामग्री: कलश में चंदन, फूल और अक्षत (चावल) छोड़ दें। अक्षत को केसर या रोली से हल्का रंग लेना चाहिए। 2. कलश स्थापना का स्थान कलश को सही दिशा में रखना पूजा की सफलता के लिए महत...

गायत्री मंत्र: अर्थ, महत्त्व और जप की सही विधि – एक विस्तृत मार्गदर्शिका

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सनातन धर्म में गायत्री मंत्र को 'वेदमाता' कहा जाता है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्म का मूल आधार है। शास्त्रों के अनुसार, नित्य गायत्री उपासना करने से मनुष्य पापमुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है और उसे आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज की प्राप्ति होती है। अक्सर लोग जानकारी के अभाव में मंत्र का जप तो करते हैं, लेकिन शास्त्रों में वर्णित सही विधि और नियमों का पालन नहीं कर पाते। इस लेख में हम गायत्री मंत्र का सही अर्थ और जप की पूर्ण विधि जानेंगे। गायत्री मंत्र और उसका अर्थ सर्वप्रथम शुद्ध उच्चारण के साथ मंत्र को जानना आवश्यक है: "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।" शब्दशः अर्थ: शास्त्रों में इस महामंत्र के एक-एक शब्द का गहरा अर्थ बताया गया है: • ॐ: परब्रह्म परमात्मा। • भूः सत् (सत्य स्वरूप)। • भुवः चित् (चेतन स्वरूप)। • स्वः आनन्द स्वरूप। • तत्: उस। • सवितुः देवस्य: सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के। • वरेण्यं: वरण करने योग्य (श्रेष्ठ)। • भर्गः अविद्यानाशक तेज का। • धीमहि: हम ध्य...

शिवमानस पूजा स्तोत्र — अर्थ, विधि व लाभ (हिंदी)

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"क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए आपको महँगी पूजा सामग्री या धन की आवश्यकता नहीं है? आदि शंकराचार्य द्वारा रचित शिवमानसपूजा (Shiv Manas Puja) एक ऐसी अद्भुत स्तुति है, जिसके माध्यम से आप केवल अपने मन की शक्ति से महादेव को राजसी उपचार अर्पित कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार, बाह्य पूजा की तुलना में मानस पूजा (Mental Worship) को करोड़ों गुना अधिक फलदायी और श्रेष्ठ माना गया है,। चाहे आप यात्रा में हों या पूजा सामग्री का अभाव हो, शिवमानसपूजा के द्वारा आप भगवान शिव को मानसिक रूप से रत्नजड़ित सिंहासन, पंचामृत स्नान और दिव्य वस्त्र अर्पित कर असीमित पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। इस लेख में हम आपके लिए लाए हैं   संपूर्ण शिवमानसपूजा स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित। साथ ही जानें कि कैसे यह मानसिक आराधना आपके समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों का नाश कर आपको मानसिक शांति और शिव-कृपा का पात्र बनाती है।" शिवमानस पूजा 1. मानसिक उपचारों का समर्पण रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्। जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं देव दयानिध...