कलश पूजन कैसे करें? सही मंत्र, नियम और शास्त्रानुसार महत्त्व
कलश पूजन विधि: सनातन धर्म में किसी भी पूजा का शुभारंभ गणेश पूजन 'कलश पूजन' या 'उदकुम्भ-पूजा' के बिना अधूरा माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, कलश में सभी देवी-देवताओं, समुद्रों और पवित्र नदियों का वास होता है। कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र और मूल में ब्रह्माजी स्थित होते हैं। नित्य पूजा और विशेष अनुष्ठानों में सुवासित जल से भरे कलश का पूजन अनिवार्य है। इस लेख में हम शास्त्रों में वर्णित कलश पूजन की प्रामाणिक विधि और मंत्रों को विस्तार से जानेंगे।
• जल की शुद्धता: ताजे जल को कपड़े से छानकर कलश में भरें। शास्त्रों में बासी जल का निषेध है, लेकिन गंगाजल कभी बासी नहीं होता।
• सुवासित जल: कलश के जल को सुगंधित करने के लिए उसमें थोड़ा कपूर, केसर और चंदन घिसकर मिला दें या पवित्र इत्र डाल दें।
• सामग्री: कलश में चंदन, फूल और अक्षत (चावल) छोड़ दें। अक्षत को केसर या रोली से हल्का रंग लेना चाहिए।
• बायीं ओर: पूजा करते समय सुवासित जल से भरा उदकुम्भ (कलश) अपनी बायीं ओर रखना चाहिए।
• विशेष नियम: कलश के जल में शंख को डुबोना मना है और शंख को पृथ्वी पर रखना भी वर्जित है, इसलिए शंख को दायीं ओर और कलश को बायीं ओर स्थापित करें।
(क) प्रधान आवाहन मंत्र
कलश में त्रिमूर्ति और मातृशक्तियों के आवाहन के लिए निम्न मंत्र बोलें:
ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥ कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा। ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥ अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः। अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
अर्थ: कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, और मूल भाग में ब्रह्माजी स्थित हैं। कलश के मध्य भाग में मातृगण (देवियाँ) निवास करती हैं। इसकी कोख में सातों समुद्र और सात द्वीपों वाली पृथ्वी समाहित है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने अंगों सहित इस कलश में आश्रय लिए हुए हैं। यहाँ गायत्री, सावित्री, शांति और पुष्टि भी मौजूद हैं।
(ख) पवित्र नदियों का आवाहन
इसके बाद कलश के जल में पवित्र नदियों का आवाहन करें:
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
अर्थ: पापों का नाश करने वाले सभी तीर्थ मेरे द्वारा की जाने वाली देवपूजा के लिए यहाँ पधारें। हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी! आप सभी इस जल में सन्निहित (उपस्थित) हो जाएँ।
1. गंध: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, गंधं समर्पयामि।' चंदन लगाएं।
2. पुष्प: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, पुष्पं समर्पयामि।' फूल चढ़ाएं।
3. धूप: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, धूपं आघ्रापयामि।' धूप दिखाएं।
4. दीप: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, दीपं दर्शयामि।' दीपक दिखाएं।
5. नैवेद्य: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, नैवेद्यं निवेदयामि।' भोग लगाएं।
विशेष नोट: पूजा में यदि गंगाजल का प्रयोग हो रहा है, तो उसमें किसी अन्य तीर्थ के आवाहन की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि गंगाजल स्वयं पूर्ण है
1. कलश पूजन की तैयारी और सामग्री
पूजन आरंभ करने से पूर्व कुछ विशेष तैयारियों का ध्यान रखना आवश्यक है:
• जल की शुद्धता: ताजे जल को कपड़े से छानकर कलश में भरें। शास्त्रों में बासी जल का निषेध है, लेकिन गंगाजल कभी बासी नहीं होता।
• सुवासित जल: कलश के जल को सुगंधित करने के लिए उसमें थोड़ा कपूर, केसर और चंदन घिसकर मिला दें या पवित्र इत्र डाल दें।
• सामग्री: कलश में चंदन, फूल और अक्षत (चावल) छोड़ दें। अक्षत को केसर या रोली से हल्का रंग लेना चाहिए।
2. कलश स्थापना का स्थान
कलश को सही दिशा में रखना पूजा की सफलता के लिए महत्त्वपूर्ण है।
• बायीं ओर: पूजा करते समय सुवासित जल से भरा उदकुम्भ (कलश) अपनी बायीं ओर रखना चाहिए।
• विशेष नियम: कलश के जल में शंख को डुबोना मना है और शंख को पृथ्वी पर रखना भी वर्जित है, इसलिए शंख को दायीं ओर और कलश को बायीं ओर स्थापित करें।
3. कलश पूजन विधि और मंत्र
सुवासित जल से भरे हुए कलश (उदकुम्भ) की 'उदकुम्भाय नमः' इस नाम-मंत्र से गंध (चंदन), फूल आदि चढ़ाकर पूजा करें। इसके बाद कलश में हाथ जोड़कर तीर्थों और देवताओं का आवाहन करें।
(क) प्रधान आवाहन मंत्र
कलश में त्रिमूर्ति और मातृशक्तियों के आवाहन के लिए निम्न मंत्र बोलें:
ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥ कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा। ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥ अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः। अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
अर्थ: कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, और मूल भाग में ब्रह्माजी स्थित हैं। कलश के मध्य भाग में मातृगण (देवियाँ) निवास करती हैं। इसकी कोख में सातों समुद्र और सात द्वीपों वाली पृथ्वी समाहित है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने अंगों सहित इस कलश में आश्रय लिए हुए हैं। यहाँ गायत्री, सावित्री, शांति और पुष्टि भी मौजूद हैं।
(ख) पवित्र नदियों का आवाहन
इसके बाद कलश के जल में पवित्र नदियों का आवाहन करें:
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
अर्थ: पापों का नाश करने वाले सभी तीर्थ मेरे द्वारा की जाने वाली देवपूजा के लिए यहाँ पधारें। हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी! आप सभी इस जल में सन्निहित (उपस्थित) हो जाएँ।
4: पंचोपचार पूजन
प्रार्थना के बाद कलश की विधिवत पूजा करें। यदि वैदिक मंत्र न आते हों, तो नाम-मंत्र का प्रयोग करें:
1. गंध: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, गंधं समर्पयामि।' चंदन लगाएं।
2. पुष्प: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, पुष्पं समर्पयामि।' फूल चढ़ाएं।
3. धूप: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, धूपं आघ्रापयामि।' धूप दिखाएं।
4. दीप: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, दीपं दर्शयामि।' दीपक दिखाएं।
5. नैवेद्य: 'ॐ उदकुम्भाय नमः, नैवेद्यं निवेदयामि।' भोग लगाएं।
विशेष नोट: पूजा में यदि गंगाजल का प्रयोग हो रहा है, तो उसमें किसी अन्य तीर्थ के आवाहन की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि गंगाजल स्वयं पूर्ण है
5. प्रार्थना मंत्र
आवाहन के पश्चात कलश देवता से प्रार्थना करें कि वे पूजा में सन्निहित होकर कार्य को सिद्ध करें। इसके लिए निम्न मंत्र पढ़ें:
देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ। उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ ! विधृतो विष्णुना स्वयम्॥ त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः। त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः॥ शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः। आदित्य वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः॥ त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः। त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भव ! सानिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥
भावार्थ: हे कुम्भ! देवताओं और दानवों के संवाद (समुद्र मंथन) के समय जब महासागर मथा गया, तब आप उत्पन्न हुए और स्वयं भगवान विष्णु ने आपको धारण किया। आपके जल में सभी तीर्थ हैं और आपमें सभी देवता स्थित हैं। आपमें ही सम्पूर्ण प्राणी और प्राण प्रतिष्ठित हैं। आप ही शिव, विष्णु और प्रजापति (ब्रह्मा) हैं। आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव और पितृगण—ये सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले देवता आपमें निवास करते हैं। हे जलोद्भव देव! आपकी कृपा से मैं यह यज्ञ (पूजन) करने की इच्छा करता हूँ। आप मेरे इस कार्य में सन्निहित होकर सदा प्रसन्न रहें।
भावार्थ: हे कुम्भ! देवताओं और दानवों के संवाद (समुद्र मंथन) के समय जब महासागर मथा गया, तब आप उत्पन्न हुए और स्वयं भगवान विष्णु ने आपको धारण किया। आपके जल में सभी तीर्थ हैं और आपमें सभी देवता स्थित हैं। आपमें ही सम्पूर्ण प्राणी और प्राण प्रतिष्ठित हैं। आप ही शिव, विष्णु और प्रजापति (ब्रह्मा) हैं। आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव और पितृगण—ये सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले देवता आपमें निवास करते हैं। हे जलोद्भव देव! आपकी कृपा से मैं यह यज्ञ (पूजन) करने की इच्छा करता हूँ। आप मेरे इस कार्य में सन्निहित होकर सदा प्रसन्न रहें।
उपर्युक्त विधि से कलश का पूजन करने से पूजा स्थल पवित्र हो जाता है और भक्त को सभी तीर्थों में स्नान का फल मानसिक रूप से प्राप्त होता है। नित्य पूजन में यदि इतना समय न हो, तो 'उदकुम्भाय नमः' कहकर गंध-पुष्प चढ़ाएं और संक्षिप्त प्रार्थना कर लें, परन्तु विशेष अवसरों पर पूर्ण विधि का पालन करना ही श्रेयस्कर है।
क्या आप अपने घर की पूजा में कलश स्थापना के इन नियमों का पालन करते हैं?
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