गायत्री मंत्र: अर्थ, महत्त्व और जप की सही विधि – एक विस्तृत मार्गदर्शिका
अक्सर लोग जानकारी के अभाव में मंत्र का जप तो करते हैं, लेकिन शास्त्रों में वर्णित सही विधि और नियमों का पालन नहीं कर पाते। इस लेख में हम गायत्री मंत्र का सही अर्थ और जप की पूर्ण विधि जानेंगे।
गायत्री मंत्र और उसका अर्थ
सर्वप्रथम शुद्ध उच्चारण के साथ मंत्र को जानना आवश्यक है:• ॐ: परब्रह्म परमात्मा।
• भूः सत् (सत्य स्वरूप)।
• भुवः चित् (चेतन स्वरूप)।
• स्वः आनन्द स्वरूप।
• तत्: उस।
• सवितुः देवस्य: सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के।
• वरेण्यं: वरण करने योग्य (श्रेष्ठ)।
• भर्गः अविद्यानाशक तेज का।
• धीमहि: हम ध्यान करते हैं।
• यः जो (परमात्मा)।
• नः हमारी।
• धियः बुद्धि को।
• प्रचोदयात्: (सत्कर्मों की ओर) प्रेरित करे।
जप की सही विधि
शास्त्रों में गायत्री जप के लिए कुछ विशेष नियम और मर्यादाएँ बताई गई हैं, जिनका पालन करने से ही मंत्र सिद्ध होता है।1. जप का समय और दिशा
गायत्री जप त्रिकाल संध्या (प्रातः, मध्याह्न और सायं) के समय करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।• प्रातःकाल: तारों के रहते हुए पूर्व दिशा की ओर मुख करके जप आरंभ करें और सूर्योदय तक करें।
• सायंकाल: सूर्यास्त से पूर्व पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप आरंभ करें और तारे निकलने तक करें।
• सायंकाल: सूर्यास्त से पूर्व पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप आरंभ करें और तारे निकलने तक करें।
2. माला और हाथों की स्थिति
जप के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। जप करते समय हाथों की स्थिति समय के अनुसार बदलती है:
• प्रातःकाल: हाथों को नाभि के पास रखें।
• मध्याह्न: हाथों को हृदय के समीप रखें।
• सायंकाल: हाथों को मुख के समानान्तर रखें।
गोमुखी का प्रयोग: जप करते समय दाहिने हाथ को खुला नहीं रखना चाहिए। हाथ को 'गोमुखी' (जपमाली) में डालकर या कपड़े से ढककर ही जप करना चाहिए, अन्यथा जप निष्फल माना जाता है।
3. जप कैसे करें?
• माला को अनामिका (Ring finger) पर रखकर अँगूठे से स्पर्श करते हुए मध्यमा (Middle finger) से फेरना चाहिए। तर्जनी (Index finger) का स्पर्श निषिद्ध है।
• सुमेरु का उल्लंघन न करें: माला फेरते समय जब सुमेरु (मुख्य मनका) आ जाए, तो माला को वहीं से घुमा लेना चाहिए, उसे लांघना नहीं चाहिए।
• संख्या: प्रतिदिन 108 बार (एक माला) जप करना चाहिए। यदि समयाभाव हो, तो कम-से-कम 10 बार जप अवश्य करें।
4. जप के तीन प्रकार
जप तीन प्रकार का होता है, जिसमें मानसिक जप को सबसे उत्तम माना गया है:
1. वाचिक: मंत्र को बोलकर (उच्चारण के साथ) जपना।
2. उपांशु: जिसमें केवल जीभ और होंठ हिलते हैं, लेकिन आवाज दूसरे को सुनाई नहीं देती।
3. मानसिक: बिना होंठ हिलाए, केवल मन में मंत्र का चिंतन करना (यह सर्वश्रेष्ठ है)।
5. ॐ के उच्चारण का नियम:
गृहस्थ और ब्रह्मचारी को गायत्री मंत्र के आरंभ में 'ॐ' लगाना चाहिए, लेकिन मंत्र के अंत में 'ॐ' का उच्चारण नहीं करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, अंत में ॐ लगाने से सिद्धि नहीं मिलती।
ध्यान और न्यास
पूर्ण फल प्राप्ति के लिए जप से पूर्व 'न्यास' और 'ध्यान' का विधान है।
• ध्यान: समय के अनुसार गायत्री माता के स्वरूप का ध्यान करें:
• सुबह: लाल रंग वाली, हंस पर सवार, ब्रह्मरूपा (कुमारी)।
• दोपहर: पीले वस्त्र वाली, गरुड़ पर सवार, विष्णुरूपा (युवती)।
• शाम: वृषभ (बैल) पर सवार, शिवरूपा (वृद्धा)।
• शाप-विमोचन: शास्त्रों में उल्लेख है कि गायत्री मंत्र ब्रह्मा, वसिष्ठ, विश्वामित्र और शुक्र द्वारा शापित (कीलित) है। अतः जप से पूर्व शाप-विमोचन मंत्रों का पाठ करना उचित माना जाता है।
निष्कर्ष और समर्पण
जप पूरा होने पर भगवान से प्रार्थना करें और जप को समर्पित करें। इसके लिए निम्न मंत्र बोलें:"अनेन गायत्रीजपकर्मणा सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायणः प्रीयतां न मम।"
भावार्थ: इस गायत्री जप कर्म से सर्वान्तर्यामी भगवान नारायण प्रसन्न हों, यह मेरा नहीं है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें