लिङ्गाष्टकम् | Lingashtakam Stotram Sanskrit-Hindi

lingastakam-stotram

लिङ्गाष्टकम् भगवान सदाशिव को समर्पित अत्यंत प्रभावशाली आठ-श्लोकीय स्तोत्र है जिसे भगवान शिव की कृपा पाने, पापों के नाश व आध्यात्मिक उन्नति हेतु पाठ करना चाहिए। इस पोस्ट में आपको 100% शुद्ध संस्कृत मूल पाठ के साथ सरल व प्रामाणिक हिन्दी अर्थ प्रदान किया गया है—एक भी शब्द बिना काट-छाँट के। 

यदि आप रोज़ इस स्तोत्र का पाठ करते हैं तो कहा जाता है कि शिवलोक की प्राप्ति व भोलेनाथ की सदा कृपा बनी रहती है। अतः इसे शिवसन्निधि में पढ़ें और अपने जीवन में सुख, शांति व समृद्धि का वरदान पाएँ।


ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं

निर्मलभासितशोभितलिङ्गं ।

जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥१॥


हे सदाशिवलिङ्ग! ब्रह्मा, विष्णु व इन्द्रादि देवताओं द्वारा पूजित, निर्मल तेज से दीप्तिमान, जन्म-दुःखों का विनाश करने वाले आपको नमस्कार।


देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं

कामदहं करुणाकरलिङ्गं ।

रावणदर्पविनाशनलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥२॥


हे सदाशिवलिङ्ग! देव-मुनियों द्वारा पूजित, कामदेव को भस्म करने वाले, करुणा-समुद्र, रावण के अहंकार-विनाशक आपको नमस्कार।


सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं

बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गं ।

सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥३॥


हे सदाशिवलिङ्ग! सुगन्धित पदार्थों से अलंकृत, बुद्धि बढ़ाने वाले, सिद्ध-देव-असुरों द्वारा वन्दित आपको नमस्कार।


कनकमहामणिभूषितलिङ्गं

फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गं ।

दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥४॥


हे सदाशिवलिङ्ग! सोने-रत्नों से अलंकृत, वासुकि नाग से आच्छादित, दक्ष-यज्ञ-विनाशक आपको नमस्कार।


कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं

पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गं ।

सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥५॥


हे सदाशिवलिङ्ग! कुङ्कुम-चन्दन से लिपित, कमल-माला से सुशोभित, संचित पापों के विनाशक आपको नमस्कार।


देवगणार्चितसेवितलिङ्गं

भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गं ।

दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥६॥


 हे सदाशिवलिङ्ग! देवगणों द्वारा पूजित-सेवित, भक्ति-भाव से उपासित, कोटि-सूर्य-सम प्रभावाले आपको नमस्कार।


अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं

सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गं ।

अष्टदरिद्रविनाशनलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥७॥


हे सदाशिवलिङ्ग! अष्टदल-कमल से आवृत, सब उत्पत्तियों के कारण, अष्ट-दरिद्रता-विनाशक आपको नमस्कार।


सुरगुरुं सुरवरप्रियलिङ्गं

सुस्वपक्षितिर्थमालिन्गं ।

जगदपहारकारणलिङ्गं

तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गं ॥८॥


हे सदाशिवलिङ्ग! देवताओं के गुरु व प्रिय, शुभ पक्षियों-तीर्थों से सेवित, संसार-प्रलय-कारण आपको नमस्कार।


लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं

यः पठेत् शिवसन्निधौ ।

शिवलोकमवाप्नोति

शिवेन सह मोदते ॥


जो भी इस पुण्य लिङ्गाष्टकम् को शिव-

सन्निधि में पढ़ता है, वह शिवलोक को प्राप्त कर शिव के साथ आनन्द मनाता है।

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